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पुलिसकर्मी बने चाटुकार

Posted On: 19 Dec, 2013 Others में

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भारत में व्यक्ति पूजा की प्रथा शुरू से ही चली आ रही है. इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं जब धर्म गुरुओं, खिलाड़ियों और राज नेताओं ने खुद को इस रूप में स्थापित किया कि लोग इनसे जुड़ते चले गए. इस जुड़ाव में एक तरफ निष्ठा और भक्ति है तो दूसरी तरफ स्वार्थ और छलावा भी.


lalu and policeचारा घोटाले में दोषी ठहराए गए आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव जेल से बाहर क्या आए उनके चाटुकारों ने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी है. बिहार और झारखंड में जहां आरजेडी का गढ़ है वहां खुशिया मनाई जा रही है. उन्हें देखने के लिए भीड़ लग रही है. चाटुकारों की भक्ति देखकर ऐसा लगता है जैसे भगवान सीधे जेल से बाहर आ गए हैं. हद तो तब हो गई जब एक सरकारी सिपाही उनकी चरणों में नतमस्तक हो गया.


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घटना ने झारखंड के रामगढ़ जिले के रजप्पा इलाके में बने मां छिन्न मस्तिका मंदिर की है जब लालू सोमवार को जमानत मिलने के बाद रांची से पटना वाया रोड जा थे. उस मंदिर में लोग भगवान को देखने के लिए कम और लालू को देखने के लिए उमड़ रहे थे. उसी दौरान डीएसपी रैंक के एक अधिकारी अशोक शर्मा ने अपने मूल कर्तव्य को भूलकर लालू प्रसाद यादव के पैर पानी से धोने लगा. दरअसल मंदिर में घुसने से पहले लालू को ख्याल आया कि पैर भी धोने हैं. वह किनारे रखी एक बाल्टी के नजदीक गए वहीं पर खाकी वर्दी पहने अशोक शर्मा ने घुटनों के बल बैठ गए और घड़े के ऊपर रखे मग से पानी भरकर लालू प्रसाद यादव के पैर धोने लगे. अशोक शर्मा ने यह सब करते समय वर्दी की गरिमा का ख्याल भी नहीं रखा. शायद उन्होंने लालू प्रसाद यादव की नजरों में चढ़ने के लिए अपनी सामान्य सुरक्षा ड्यूटी को छोड़कर एक चारण की भूमिका निभाना अपना कर्तव्य समझा. भक्ति में किसी तरह की कमी न हो इसलिए लालू प्रसाद यादव के एक अन्य भक्त (पुलिसकर्मी) ने लालू की चप्पलें हाथ में लेकर उसकी रखवारी कर रहा था.


वैसे राजनीति में चाटुकारी एक आम सी बात है. उत्तर प्रदेश इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. चाहे मुलायम की सरकार हो या फिर मायावती की कार्यकर्ता से लेकर नेता और अधिकारी तक हर कोई नंबर बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े नेताओं के चरणों में नतमस्तक रहता है. अखबारों में तस्वीरें छपने के बाद फिलहाल तो इस मामले में रांची पुलिस मुख्यालय ने उन दोनों पुलिस कर्मियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं लेकिन सवाल अब भी है कि भारतीय समाज कब तक एक व्यक्ति के प्रति अंधानुकरण या समर्पण में लीन रहेगा.


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